लेखिका: सुनीता (एक गृहिणी, एक माँ, और
एक पत्नी)
विषय: कैसे मैंने अपने पति को उस अंधेरे
से बाहर निकाला जहाँ वो खुद को खो चुके थे
पढ़ने का समय: 15-20 मिनट (यह कहानी शायद
आपकी अपनी कहानी जैसी लगे)
आज मैं जो लिखने जा रही हूँ, वह किसी किताब की कहानी नहीं है। यह मेरे आँसुओं, मेरी रातों की नींद, मेरे डर और अंत में मेरी जीत की कहानी है। हम औरतें अक्सर अपने घर की चार दीवारी के अंदर बहुत कुछ सहती हैं। हम अपने पति के माथे की शिकन पढ़ लेती हैं, उनकी खामोशी सुन लेती हैं, लेकिन अक्सर समाज की शर्म या "लोग क्या कहेंगे" के डर से हम उस पर बात नहीं करतीं।
मैं सुनीता, 38 साल की हूँ। मेरे पति रवि, 42 साल के हैं। हमारी शादी को 14 साल हो चुके हैं। दो प्यारे बच्चे हैं। ऊपर से देखने पर हमारा परिवार बिल्कुल हँसता-खेलता लगता था। लेकिन घर के दरवाज़े बंद होने के बाद, उस सन्नाटे में जो मैं महसूस करती थी, वो शायद सिर्फ़ एक पत्नी ही समझ सकती है।
रवि हमेशा से ऐसे नहीं थे। जब हमारी शादी हुई थी, तो उनकी ऊर्जा देखते ही बनती थी। वो ऑफिस से आकर भी थके नहीं लगते थे। हम शाम को साथ चाय पीते, बाज़ार जाते, और रातें... वो रातें बातों और प्यार से भरी होती थीं। उनकी हँसी से घर गूँजता था। वो बच्चों को हवा में उछालते थे, मुझे किचन में पीछे से आकर चौंका देते थे। वो जीवन से भरे हुए थे।
लेकिन पिछले 2-3 सालों में, जैसे किसी ने नज़र लगा दी हो। शुरुआत बहुत मामूली चीज़ों से हुई, जिन पर मैंने पहले ध्यान नहीं दिया।
वो ऑफिस से आते और सीधे सोफे पर निढाल होकर गिर जाते। पहले वो चाय के साथ दिन भर की बातें करते थे, अब वो सिर्फ फ़ोन में सिर झुकाए बैठे रहते। जब मैं पूछती, "दिन कैसा रहा?", तो जवाब मिलता—"बस ठीक था, बहुत थकान है।"धीरे-धीरे यह थकान उनके स्वभाव में घुस गई। बच्चों का शोर उन्हें चुभने लगा। जिस पिता के आने का बच्चे इंतज़ार करते थे, अब उसके आने पर वो डरकर अपने कमरे में चले जाते क्योंकि पापा "गुस्से में" होंगे। वीकेंड पर बाहर जाने का नाम लो, तो वो चिड़चिड़ा जाते—"पूरे हफ्ते काम करता हूँ, एक दिन भी आराम नहीं कर सकता क्या?"
मैं चुप रह जाती। मुझे लगता शायद काम का बोझ सच में ज्यादा है। मैं उन्हें अच्छा खाना खिलाती, बादाम वाला दूध देती, लेकिन कोई असर नहीं हो रहा था। वो सूखते जा रहे थे, चेहरे पर एक कालापन आ गया था, और आँखों के नीचे गहरे गड्ढे।
संजय, मध्य प्रदेश
"मेरी जिंदगी बदल गई..."
बाहरी बदलाव तो फिर भी सहे जा सकते थे, लेकिन जो चीज़ मुझे अंदर से तोड़ रही थी, वो थी हमारे बीच की शारीरिक और भावनात्मक दूरी।
एक पत्नी के लिए उसका पति सिर्फ सुरक्षा नहीं, उसका अभिमान भी होता है। जब वो आपको प्यार भरी नज़रों से देखता है, तो आपको अपनी सुंदरता पर विश्वास होता है। लेकिन रवि ने मेरी तरफ देखना ही बंद कर दिया था।
रात को बत्ती बुझते ही एक अजीब सा तनाव कमरे में भर जाता था। मैं इंतज़ार करती कि शायद आज वो मेरा हाथ थामेंगे, शायद आज वो मुझे अपने गले लगाएंगे। लेकिन वो करवट बदलकर सो जाते, या सोने का नाटक करते। कभी-कभी मैं हिम्मत करके उनके करीब जाती, तो वो कोई न कोई बहाना बना देते—"सुनीता, आज कमर में बहुत दर्द है", "कल सुबह जल्दी मीटिंग है", "प्लीज, मुझे सोने दो।"
शुरुआत में मुझे लगा कि शायद मुझमें कोई कमी आ गई है। मैंने अपना वज़न चेक किया, नए कपड़े पहने, खुद को संवारा। लेकिन उनकी नज़रों में वो 'प्यास' ही नहीं थी। वो मेरी तरफ देखते तो थे, पर प्यार से नहीं, बल्कि एक अजीब सी अपराधी भावना से। जैसे वो मुझसे माफ़ी माँग रहे हों।
कई रातें मैंने बाथरूम में जाकर, नल चलाकर रोते हुए गुज़ारीं। मेरे मन में हज़ारों सवाल उठते थे—क्या उनका चक्कर किसी और के साथ है? क्या अब वो मुझसे प्यार नहीं करते? क्या हमारी शादीशुदा ज़िंदगी का अंत आ गया है?
करीब 4 महीने पहले की बात है। हमारी शादी की सालगिरह थी। मैंने बहुत उत्साह से तैयारी की थी। सोचा था आज सब ठीक हो जाएगा। लेकिन उस रात भी वही हुआ। वो आए, थके हुए थे, खाना खाया और सो गए। उन्होंने मुझे विश तक नहीं किया।
मैं बर्दाश्त नहीं कर पाई। मैंने उन्हें झिंझोड़ कर उठाया। मैं चिल्लाई, रोई, मैंने पूछा—"आखिर चल क्या रहा है? अगर आपको मुझसे नफरत है तो बोल दीजिए। ऐसे घुट-घुट कर मैं नहीं जी सकती।"
रवि उठकर बैठ गए। मैंने पहली बार उनकी आँखों में आंसू देखे। वो एक मज़बूत मर्द, जो कभी नहीं रोता था, मेरे सामने फूट-फूट कर रो पड़ा।
उन्होंने जो कहा, उसने मेरा दिल पसीज दिया। उन्होंने कहा, "सुनीता, मैं तुमसे नफरत नहीं करता। मैं तो खुद से नफरत करने लगा हूँ। मेरा शरीर मेरा साथ नहीं दे रहा। मैं चाहता हूँ कि हम पहले की तरह रहें, लेकिन अंदर से मैं बिल्कुल खाली महसूस करता हूँ। न ताकत बची है, न इच्छा। मुझे लगता है मैं नामर्द होता जा रहा हूँ। मुझे शर्म आती है तुम्हारे पास आने में, क्योंकि मैं तुम्हें वो खुशी नहीं दे पाता जिसकी तुम हक़दार हो।"
उस पल मेरा सारा गुस्सा काफूर हो गया। मुझे अपनी गलती का एहसास हुआ। मैं अपने "अहंकार" और अपनी "ज़रूरतों" के बारे में सोच रही थी, जबकि मेरा पति एक ऐसी लड़ाई लड़ रहा था जिसमें वो रोज़ हार रहा था। वो मुझसे दूर नहीं भाग रहे थे, वो अपनी "नाकामी" से भाग रहे थे।
मैंने उन्हें गले लगाया और वादा किया—"हम मिलकर इसे ठीक करेंगे। यह कोई अंत नहीं है।"
संजय, मध्य प्रदेश
"मेरी जिंदगी बदल गई..."
अगले दिन से मेरा मिशन शुरू हुआ। रवि डॉक्टर के पास जाने के नाम से ही डरते थे। उन्हें लगता था कि कोई जान जाएगा तो उनकी इज्ज़त मिट्टी में मिल जाएगी। इसलिए ज़िम्मेदारी मेरे कंधों पर थी।
मैंने इंटरनेट छान मारा। हज़ारों वीडियो देखे। मुझे पता चला कि 40 की उम्र के बाद पुरुषों में टेस्टोस्टेरोन कम होने लगता है, तनाव नसों को कमजोर कर देता है, और आज का खान-पान शरीर को अंदर से खोखला कर रहा है।
बाज़ार में बहुत लूट मची थी। कोई "जादुई तेल" बेच रहा था, कोई "एक घंटे में असर" वाली गोली। मैंने एक-दो चीज़ें मंगवाईं भी, लेकिन उनसे रवि को सिरदर्द और घबराहट होने लगी। हम डर गए। हम कोई ऐसी चीज़ नहीं चाहते थे जो उनकी किडनी या दिल पर असर करे।
मैं हताश हो चुकी थी। क्या सच में इसका कोई सुरक्षित इलाज नहीं है?
एक दिन मैं फेसबुक पर स्क्रॉल कर रही थी, तभी मेरी नज़र Vitaora के एक वीडियो पर पड़ी। उसमें कोई बड़ा वादा या अश्लील बात नहीं थी। उसमें एक आयुर्वेद विशेषज्ञ समझा रहे थे कि समस्या "सिर्फ एक अंग" की नहीं, बल्कि "पूरे शरीर के संतुलन" की होती है।
उन्होंने समझाया कि कैसे हमें समस्या की जड़ पर काम करना होता है:
यह "कॉम्बो" मुझे बहुत लॉजिकल (तर्कसंगत) लगा। यह कोई "दवा" नहीं, बल्कि एक "लाइफस्टाइल करेक्शन किट" (जीवनशैली सुधारने का पैक) लग रहा था। और कीमत? सिर्फ ₹999। मैंने सोचा, हमने हज़ारों रुपये डॉक्टरों और बेकार की चीज़ों पर उड़ा दिए, एक बार इसे भी आज़मा लेते हैं।
जब पैकेट आया, तो उस पर कहीं नहीं लिखा था कि अंदर क्या है। यह बात मुझे बहुत अच्छी लगी क्योंकि रवि को प्राइवेसी की बहुत चिंता थी।
संजय, मध्य प्रदेश
"मेरी जिंदगी बदल गई..."
रवि पहले तैयार नहीं थे। उनका आत्मविश्वास इतना टूट चुका था कि उन्हें लगता था अब कुछ नहीं हो सकता। मैंने उन्हें कहा, "रवि, आप यह मेरे लिए करेंगे। बस एक महीना। अगर फर्क नहीं पड़ा, तो मैं दोबारा कभी कुछ नहीं कहूँगी।"
और फिर हमने यह सफर शुरू किया। मैंने इसे एक "इलाज" की तरह नहीं, बल्कि "सेवा" की तरह लिया।
मैंने नियम बना लिया। रोज सुबह नाश्ते के बाद मैं उन्हें गुनगुने दूध के साथ एक कैप्सूल देती थी। इसमें मौजूद जड़ी-बूटियों ने पहले 10 दिनों में ही अपना असर दिखाना शुरू कर दिया। वो जो सुबह उठकर "टूटा हुआ" महसूस करते थे, अब अलार्म बजते ही उठने लगे। उनकी आँखों का पीलापन जाने लगा। यह कैप्सूल उनकी "बैटरी" को फिर से चार्ज कर रहा था।
मैंने कॉम्बो के साथ मिली डाइट बुक को पूरा पढ़ा। मुझे समझ आया कि मैं अनजाने में उन्हें ऐसी चीज़ें खिला रही थी जो उन्हें सुस्त बना रही थीं। मैंने तुरंत बदलाव किए। मैंने उनकी डाइट में खजूर, कद्दू के बीज, और हरी सब्ज़ियां बढ़ाईं। मैंने शाम की तली-भुनी चाय की जगह उन्हें सूप या जूस देना शुरू किया। उनका पेट साफ रहने लगा, और वो हल्का महसूस करने लगे।
रवि को कसरत से नफरत थी। लेकिन इस ई-बुक में दी गई 'केगल एक्सरसाइज' (Kegel Exercises) बहुत आसान थी। इसे वो बैठे-बैठे ऑफिस में भी कर सकते थे। मैंने उन्हें समझाया कि यह उनकी पेल्विक (निचले हिस्से) की मांसपेशियों को मज़बूत करेगी। उन्होंने इसे मज़ाक में शुरू किया, लेकिन 15 दिन बाद उन्होंने खुद माना कि उन्हें अपना शरीर ज्यादा "कंट्रोल" में लग रहा है। उनका स्टैमिना बढ़ने लगा था।
यह हिस्सा सबसे महत्वपूर्ण था। तेल का उपयोग केवल शारीरिक नहीं था, यह मानसिक जुड़ाव भी था। यह तेल सुरक्षित और चिपचिपाहट रहित था। इसके नियमित उपयोग ने वहां की नसों में रक्त प्रवाह को सुधारा। रवि ने बताया कि उन्हें वहां "गर्माहट" और "ताकत" महसूस होने लगी है जो सालों से गायब थी।
हमने इसे साथ पढ़ा। इसमें रिश्तों को तरोताजा रखने के जो तरीके बताए गए थे, वो कमाल के थे। हमने समझा कि हम "रोबोट" की तरह जी रहे थे। हमने फिर से एक-दूसरे से बातें करना शुरू किया, एक-दूसरे को सराहना शुरू किया। इस किताब ने हमारे दिमाग के ताले खोल दिए।
तीसरे हफ्ते का एक वाकया मुझे हमेशा याद रहेगा। रविवार का दिन था। रवि सुबह जल्दी उठ गए और उन्होंने चाय बनाई। जब मैं उठी, तो वो बालकनी में गुनगुना रहे थे। 3 साल... पूरे 3 साल बाद मैंने उन्हें गुनगुनाते सुना था।
उस दिन हम बाज़ार गए। उनकी चाल में एक अलग ही आत्मविश्वास था। वो अब झुककर नहीं, सीना तानकर चल रहे थे। उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा हुआ था, और उनकी पकड़ में वो "मर्दाना ताकत" थी जिसे मैं तरस गई थी।
और फिर वो रात आई... वो रात जब हमारे बीच की सारी दूरियाँ मिट गईं। उस रात रवि में कोई झिझक नहीं थी, कोई डर नहीं था। सिर्फ प्यार और जोश था। वो बिल्कुल वैसे ही थे जैसे हमारी शादी की पहली रात को थे—ऊर्जावान, भावुक और पूरी तरह से सक्षम। उस रात के बाद, जब वो मेरे सीने पर सिर रखकर सोए, तो मैंने उनकी आँखों में वो सुकून देखा जो शायद किसी करोड़पति को भी नसीब न हो।
अगली सुबह, उन्होंने मुझे गले लगाया और सिर्फ इतना कहा—"शुक्रिया सुनीता। तुमने मुझे बचा लिया।"
संजय, मध्य प्रदेश
"मेरी जिंदगी बदल गई..."
आज हमारे घर का माहौल पूरी तरह बदल चुका है। रवि अब छोटी बातों पर नहीं चिड़चिड़ाते। वो बच्चों के साथ फुटबॉल खेलते हैं, हम वीकेंड पर घूमने जाते हैं। हमारे रिश्ते में एक नई जान आ गई है।
सखियों, मैं जानती हूँ कि आप में से बहुत सी औरतें उसी घुटन में जी रही हैं जिसमें मैं जी रही थी। आप सोचती हैं कि यह "किस्मत" है। नहीं, यह किस्मत नहीं है। यह सिर्फ शरीर में कुछ तत्वों की कमी और गलत जीवनशैली का नतीजा है।
मर्दों को बचपन से सिखाया जाता है कि उन्हें अपनी कमजोरी नहीं दिखानी है। इसलिए वो चुपचाप टूटते रहते हैं। लेकिन एक पत्नी होने के नाते, यह हमारा फर्ज है कि हम उनकी अनकही तकलीफ को समझें।
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संजय, मध्य प्रदेश
"मेरी जिंदगी बदल गई..."
संजय, मध्य प्रदेश
"मेरी जिंदगी बदल गई..."
संजय, मध्य प्रदेश
"मेरी जिंदगी बदल गई..."
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अजय चौधरी
सीकर, राजस्थान
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